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कुछ पाने की खुशी है, कुछ खोने का गम है

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कुछ पाने की खुशी है ,  कुछ खोने का गम है। Picture courtesy of  Pradeep Kumbhashi कुछ पाने की खुशी है , कुछ खोने का गम है। मुसकराहट है होंठों पर , आँखें फिर भी नम है। खुशी है कि जो मैंने देखा था सपना , कदम बढ़ चला है उसी ओर अपना। गम है कि छूटी वो भँवरों की टोली। वो मस्ती , ठिठोली वो खुशियों की होली , बिछड़ सी गई यारों की अपनी टोली। सफर में नए राह मिल तो गए हैं , पर पथ पुराने पराए हुए हैं। आगे मंजिल मुसकुराता खरा है , पीछे राह उदास परे हैं। माना सच होगा सपना वो अपना , जिसके कभी ताने - बाने बुने थे । वो मंजिल मिलेगी जिसकी खुशी है , पर राह जो छूटे उसका तो गम है। बाहर जिंदगी में खुशियों का मौसम है , पर मन में कहीं पर तो वो मातम है। वो बचपन जो छुटा सदा के लिए है। वो मस्ती जो खोई सदा के लिए है। वो यारी जो छूटी सदा के लिए है। धरती उदास , गमगीन अंबर है। पसरी खामोशी की इक चादर है। मन है उदास , खामोश जीवन है , खामोश ज़बान , खामोश कलम है।

जब रोशन हो जहाँ

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Picture courtesy of  Shan Sheehan जब रोशन हो जहाँ , तो हजारों परवाने मिल जाते है।                  छोटी-छोटी बातों के फसाने बन जाते है। पर जब दौर अंधेरे का आता है , खुद का साया भी साथ छोर जाता है। हर चीख अनसुनी सी रह जाती है , जब तकदीर की कमी रह जाती है। जब राहें रोशन हो तो मुसाफिर हजा रों मिलेंगे , खरोंच भी लग जाए तो सहारे हजारों मिलेंगे। पर वीरान राहों पर ऐसी तकदीर नहीं होती , जख्म हजारों हैं , पर उनकी कोई तस्वीर नहीं होती। Picture courtesy of  peter jackson जिन्दगी का ये कैसा दोहरा स्वरूप है ? आबाद जंगलों को हरियाली मिलती बेहिसाब है । पर हर रेगिस्तान का निर्जन बन जाता ख्वाब है। जिन्दगी के खेल भी अजीब हैं । जहाँ जीवन है , वहाँ दुनिया नहीं। जहाँ दुनिया है , वहाँ जीवन नहीं। kumar vishwas at his best awesome poetry at BIT  Video taken from YouTube channel Crazy Harsh

जिन्दगी- इक बेतहाशा दौड़

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Picture courtesy of  Mina Guli न जाने सब को क्या पाने की होर है। हाँफती जिन्दगी में क्यों ये बेतहाशा दौ ड़ हैं। धुंधली मंजिल पर क्यों नजरबंद है निगाहें। क्यो डगमगाई ये जिन्दगी की डोर है। आशा की ताक में मिलती क्यों निराशा है। जिन्दगी बनी क्यो मौत की परिभाषा है। खुशीयों के दामन में बेचैन क्यों उदासी है। खुद बहते नीर के होंठों पर क्यों प्यासी है। रौनक और गुलजार जो था, आज यू गमगीन क्यो है। बिखरी इस खामोशी में सिसकियों का शोर क्यों है। जब कभी सवाल न थे तब जवाब लाखों थे, अब जब कुछ मैं पूछ रहा, हर जुबाँ खामोश क्यों है।

आज फिर घनघोर घटा घिर आई है।

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Picture courtesy of  bc104 आज फिर घनघोर घटा घिर आई है। उदास अम्बर पर अनजान ख़ुशी सी छाई है। बेहिसाब बादल जो उमरे मन के मौसम में, आई दस्तक सावन की मन के उपवन में। ख़ामोश ज़िन्दगी में ये किसकी आहट आई है, आज फिर घनघोर घटा घिर आई है। कल तक जो झुलसी थी उपवन की कलिया, बिछड़े थे ख्वाबों से रंगीन रंगरलियाँ। गूंगे हर फ़साने पर खामोशी का पहरा था। उबलती ज़िन्दगी का घाव कुछ गहरा था। फिर अंतरमन में ये किसकी किलोल छाई है, आज फिर घनघोर घटा घिर आई है। कल तक जो बैठा था, मैं यूं ही गुपचुप सा। तपता सा, जलता सा, मुरझा सा, सहमा सा। खोये हर फ़साने थे, डूबे हर तराने थे, फिर सुलगते इस धूप पर किसकी परछाई सी छाई है। आज फिर घनघोर घटा घिर आई है।

आज आज़ादी की ओर चला हूँ मैं।

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Picture courtesy of  josefgrunig अपनी बंदिशों को झकझोर चला हूँ मैं, आज आज़ादी की ओर चला हूँ मैं। इक दौर था जब अँधेरों का घना साया था, डरा सहमा मैं मन ही मन घबराया था, दबें थे हर इक अल्फाज मन के किसी कोने में, उन अँधेरों से मुंह मोड़ चला हूँ मैं, आज आज़ादी की ओर चला हूँ मैं।       सोचा था की कभी तो वो मुकाम मुमकिन होगा,       हर कश्ती को उसका साहिल तो हासिल होगा।       पर आज जो नज़ारे यूं बदले है,       हर इनसान के ख़ुद पर जो पहरे हैं,       इनसानियत के बीच जो पनपी खाई है,       अब हर उम्मीद से मुंह  मोड़  चला हूँ मैं।       हर बंदिशों से नाता छोड़ चला हूँ मैं।       आज आज़ादी की ओर चला हूँ मैं।