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उड़ जा रे

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Picture courtesy of  Susanne Nilsson छाया जब धुंध घनेरा हो, पहचान पर तेरे पहरा हो, नभ में अंकुश चहुँओर दिखे, जब सन्नाटे सब ओर बटे।             तू आहट अपनी सुनाएगा,             नभ का पंकज खील जायेगा।                        तू पंख लगा कर  उड़  जा रे।             मंजिल से अपने जुड़ जा रे। पुलकित पावन परिभाषा तू, नव युग की रोशन आशा तू। अम्बर के आनन को छु कर, हर ज़र्रे को दिखला जा तू।             घनघोर अँधेरा छाया हो,             ज़र्रा-ज़र्रा घबराया हो।             तू रोशनी का संदेश सुना,             हर दीपक को तू जला जा रे।             तू पंख लगा कर उड़ जा रे,                        म...

आज आज़ादी की ओर चला हूँ मैं।

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Picture courtesy of  josefgrunig अपनी बंदिशों को झकझोर चला हूँ मैं, आज आज़ादी की ओर चला हूँ मैं। इक दौर था जब अँधेरों का घना साया था, डरा सहमा मैं मन ही मन घबराया था, दबें थे हर इक अल्फाज मन के किसी कोने में, उन अँधेरों से मुंह मोड़ चला हूँ मैं, आज आज़ादी की ओर चला हूँ मैं।       सोचा था की कभी तो वो मुकाम मुमकिन होगा,       हर कश्ती को उसका साहिल तो हासिल होगा।       पर आज जो नज़ारे यूं बदले है,       हर इनसान के ख़ुद पर जो पहरे हैं,       इनसानियत के बीच जो पनपी खाई है,       अब हर उम्मीद से मुंह  मोड़  चला हूँ मैं।       हर बंदिशों से नाता छोड़ चला हूँ मैं।       आज आज़ादी की ओर चला हूँ मैं।