झूठी परछाई
Art by Abhishek Kumar उत्थान अहम का जब होता है, अहंकार सिर पर होता है, भ्रमित नयन उपहास है करती, पतन से परिचय तब होता है। हम सभी अपने जीवन में ऊँचाइयों की तलाश में इतने खोए होते है कि हमें खुद पता नहीं चलता कि हमारे पाव जमीन से कब जुदा हो जाते है। हमें खुद पता नहीं होता है कि बुलंदियों को छुने के चक्कर में हम वास्तविकता से कितने दूर हो जाते हैं। शायद एसी ही परिस्थिति में आत्मविश्वास अहंकार को परिभाषित करने लगता है। हम अपने वजूद की वास्तविकता खो कर इक ऐसी परिकल्पना में लीन हो जाते है जिसका यथार्थ से कोई लेना-देना नहीं होता है। जिन्दगी की तरलता पर जब हम खुद के बजाए अपने घमंड के प्रतिबिम्ब की प्रखरता से परिचित होते है तब यथार्थ की रोशनी फरेबी चकाचौंध के बीच कही गुम सी हो जाती है। ये साहित्य की कोई कोरी कल्पना नहीं बल्कि जीवन की वास्तविकता है। हम सभी अपने जीवन के किसी-न-किसी हिस्से में इस यथार्थ से रूबरू हो चुके है। बावजूद इसके हम इस सच को नजरंदाज कर देते है। हम खुद को अपने जीवन की कहानी का रंगा सियार बना लेते है जिसके नकली रंगत उतरने के बाद की द...