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किस दर दुआ से दीदार करूँ मैं

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Picture courtesy of  Maltz Evans किस दर दुआ से दीदार करूँ मैं, हर दरवाजे पर दोजख का पैगाम लिखा है। जिन्दगी में लगी आग की दास्तां किसे सुनाऊं, आज सागर में भी धुआँ का इक कोहराम दिखा है। कत्ल आम की दास्ताँ का आलम हमसे न पूछो यारों, इनसानियत पर भी तो ये इल्जाम लगा है। इनसाफ़ भी तो खुद से इस कदर जुदा हुआ, मुझ पर ही मेरे कत्ल का इल्जाम लग गया। इनसानियत की कब्र पर दावत की शाम है। इस शाम में बटी हैवानियत की जाम है। मासूमों के लाश पर बनते है आज महल यहाँ। खुदा की खुदाई पर भी इल्जाम लगा है।

ज़िन्दगी- इक सफ़र

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Photo courtesy of  A_Peach           मुसाफ़िर हूँ, ये जग छोड़ चला हूँ मैं।      इक मुकाम से निकल दूजे की ओर चला हूँ मैं। किसी मंजिल की है मुझे परवाह नहीं, कुछ मेरा भी हो जा ऐसा कोई ख़्वाब नहीं। अनगिनत यादों से मुंह मोड़ चला हूँ मैं। मुसाफ़िर हूँ ये जग छोड़ चला हूँ मैं। जब गोद में था बादलों के तो इतराता था, अपनी विशालता पर मन ही मन इठलाता था। पर जब बूंद बना तो ये अहसास आया, कल तक जो दुनिया थी मेरी, उसको छोड़ चला हूँ मैं। अपनी दुनिया से परे इक नए डगर की और चला हूँ मैं। मुसाफ़िर हूँ, ये जग छोर चला हूँ मैं। कुछ दूर चला तो रेतो की प्यास नज़र आई, लाखों ज़िन्दगी की ओझल होती आस नज़र आई। अहसास तब आया की कुछ वजूद तो मेरा भी है इस ज़माने में, शायद अच्छा ही था यूं बारिश बन बरस जाने में।  अब जा कर ख़ुद को तराशने की ओर चला हूँ मैं। मुसाफ़िर हूँ ये जग छोड़ चला हूँ मैं।